भारत का अंतरिक्ष सफर किसी प्रेरणादायक कहानी से कम नहीं है। आज दुनिया भारत को एक मज़बूत अंतरिक्ष शक्ति के रूप में देखती है, लेकिन यह यात्रा आसान नहीं रही। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने सीमित संसाधनों और चुनौतियों के बावजूद एक-एक कदम बढ़ाते हुए वह मुकाम हासिल किया है, जिसकी कल्पना कभी असंभव मानी जाती थी।
अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम 1960 के दशक में शुरू हुआ। उस समय देश के पास न तो पर्याप्त बजट था और न ही आधुनिक तकनीक। लेकिन वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई ने इस दिशा में नई सोच दी। उन्होंने कहा था कि अगर हम विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल आम लोगों की ज़िंदगी बेहतर करने में करें, तो भारत विकास की राह पर तेज़ी से आगे बढ़ेगा। इसी सोच के साथ 1969 में ISRO की नींव रखी गई।

शुरुआती कदम और पहली सफलता
भारत का पहला उपग्रह आर्यभट्ट 1975 में लॉन्च हुआ। यह उस दौर की सबसे बड़ी उपलब्धि थी, जिसने दिखा दिया कि भारत भी अंतरिक्ष तक पहुँच सकता है। इसके बाद INSAT और IRS जैसी उपग्रह श्रृंखलाएँ आईं, जिन्होंने मौसम की सटीक जानकारी, संचार व्यवस्था और संसाधन प्रबंधन में अहम भूमिका निभाई। 1980 में स्वदेशी रॉकेट से रोहिणी उपग्रह का प्रक्षेपण भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में ऐतिहासिक पड़ाव था।

PSLV – ISRO का भरोसेमंद साथी

1990 के दशक में भारत ने PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) तैयार किया। इसे आज ISRO का सबसे भरोसेमंद रॉकेट माना जाता है। PSLV ने न केवल भारत के, बल्कि दर्जनों देशों के उपग्रह सफलतापूर्वक लॉन्च किए। 2017 में PSLV ने एक ही बार में 104 उपग्रह अंतरिक्ष में भेजकर विश्व रिकॉर्ड बनाया। यह उपलब्धि भारत की तकनीकी क्षमता और भरोसेमंद सेवाओं का सबूत थी।
मंगलयान – कम लागत में बड़ी सफलता
2013 में भारत ने मंगलयान (MOM) मिशन लॉन्च किया। यह कई मायनों में ऐतिहासिक रहा:

- भारत पहला एशियाई देश बना जिसने मंगल की कक्षा में प्रवेश किया।
- ISRO दुनिया की पहली एजेंसी बनी, जिसने पहली ही कोशिश में यह कारनामा किया।
- यह मिशन बेहद कम खर्च (लगभग 450 करोड़ रुपये) में पूरा हुआ, जो वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
चंद्रयान से चाँद तक का सफर
- चंद्रयान-1 (2008): चंद्रमा पर पानी के अणुओं की खोज की, जो बड़ी वैज्ञानिक सफलता थी।
- चंद्रयान-2 (2019): यान ने कक्षा में सफलता पाई, हालांकि लैंडर “विक्रम” की सॉफ्ट लैंडिंग सफल नहीं हो पाई।
- चंद्रयान-3 (2023): भारत ने इतिहास रचते हुए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग की। यह उपलब्धि भारत को अंतरिक्ष की शीर्ष शक्तियों की कतार में खड़ा करती है।
गगनयान – अंतरिक्ष में भारतीय अंतरिक्ष यात्री

ISRO अब और बड़ा कदम उठाने जा रहा है। गगनयान मिशन के तहत भारत 2025-26 तक अपने अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना बना रहा है। यह उपलब्धि भारत को अमेरिका, रूस और चीन जैसी शक्तियों की श्रेणी में ले आएगी।
आदित्य L1 – सूर्य का रहस्य जानने की कोशिश

2023 में लॉन्च हुआ आदित्य L1 मिशन सूर्य के अध्ययन के लिए बनाया गया है। इसका मकसद यह समझना है कि सूर्य की गतिविधियाँ धरती पर मौसम और तकनीकी प्रणालियों को कैसे प्रभावित करती हैं। यह मिशन भारत के वैज्ञानिकों की बढ़ती क्षमता का सबूत है।
वैश्विक सहयोग और वाणिज्यिक सफलता
ISRO ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ा नाम कमाया है। भारत ने अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और कई अन्य देशों के उपग्रह लॉन्च किए हैं। इसके अलावा, भारत ने अपना स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NAVIC तैयार किया है, जो GPS का विकल्प है।
आज कृषि, आपदा प्रबंधन, संचार और रक्षा जैसे क्षेत्रों में ISRO की तकनीक का व्यापक इस्तेमाल हो रहा है।
आने वाले मिशन
ISRO के पास आने वाले समय के लिए कई महत्वाकांक्षी योजनाएँ हैं:
- गगनयान मिशन – मानव को अंतरिक्ष में भेजना।
- शुक्रयान मिशन – शुक्र ग्रह का अध्ययन।
- स्पेस स्टेशन – आने वाले वर्षों में भारत का खुद का अंतरिक्ष स्टेशन।
- भविष्य के चंद्र और मंगल मिशन।
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम दुनिया के सामने एक मिसाल है। सीमित बजट और चुनौतियों के बावजूद ISRO ने वह कर दिखाया, जो कभी असंभव माना जाता था। आज भारत की गिनती उन चुनिंदा देशों में होती है, जो अंतरिक्ष की गहराइयों तक पहुँचने की क्षमता रखते हैं।
ISRO की उपलब्धियाँ सिर्फ वैज्ञानिक सफलता नहीं, बल्कि हर भारतीय के गर्व की कहानी हैं। आने वाले वर्षों में जब गगनयान और अन्य मिशन पूरे होंगे, तो भारत की गूँज न केवल धरती पर, बल्कि अंतरिक्ष की अनंत गहराइयों में भी सुनाई देगी।





