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JNU की पहली महिला कुलपति: विवादों से परे, जानें कौन हैं अकादमिक दिग्गज शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) का नाम आते ही अकादमिक उत्कृष्टता, मुखर बहस और कभी-कभी विवादों की तस्वीर ज़हन में उभरती है। इसी प्रतिष्ठित संस्थान के नेतृत्व की बागडोर संभालने वाली पहली महिला कुलपति हैं प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित। अक्सर सुर्खियों में रहने वाली शांतिश्री पंडित की पहचान सिर्फ़ विवादों तक सीमित नहीं है। उनकी अकादमिक यात्रा, भाषाई कौशल और प्रशासनिक अनुभव उन्हें शिक्षा जगत की एक प्रभावशाली हस्ती बनाते हैं। आइए, उनके व्यक्तित्व और पेशेवर सफ़र को थोड़ा और गहराई से जानते हैं।

JNU की पहली महिला कुलपति

रूस से भारत तक: एक वैश्विक अकादमिक सफ़र की शुरुआत

यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि शांतिश्री पंडित का जन्म भारत में नहीं हुआ था। 15 जुलाई 1962 को उनका जन्म रूस के सेंट पीटर्सबर्ग (तत्कालीन लेनिनग्राद, USSR) में हुआ था। उनके पिता, डी. हनुमंत राव, एक लेखक और पत्रकार थे जो भारतीय दूतावास में राजनयिक के तौर पर कार्यरत थे। उनकी माँ, डॉ. मुलामूदी आदिलक्ष्मी, लेनिनग्राद ओरिएंटल फैकल्टी विश्वविद्यालय में तमिल और तेलुगु की प्रोफेसर थीं। इस तरह, उन्हें बचपन से ही एक अंतरराष्ट्रीय और अकादमिक माहौल मिला। उनकी प्रारंभिक शिक्षा चेन्नई के एक प्रतिष्ठित स्कूल से हुई, जिसने उनकी अकादमिक नींव को और मज़बूत किया।

ज्ञान की शक्ति: JNU से पीएचडी और अकादमिक जगत में धाक

प्रोफेसर पंडित की अकादमिक साख बेहद प्रभावशाली है। उन्होंने अपनी शिक्षा में उत्कृष्टता की एक लंबी लकीर खींची है:

  • स्नातक और स्नातकोत्तर: उन्होंने कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी से इतिहास और राजनीति विज्ञान में बीए और प्रेसीडेंसी कॉलेज, चेन्नई से राजनीति विज्ञान में एमए किया।
  • एम.फिल और पीएचडी: अकादमिक उत्कृष्टता की उनकी तलाश उन्हें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ले आई, जहाँ से उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय संबंध (International Relations) में एम.फिल और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि जिस संस्थान का वह आज नेतृत्व कर रही हैं, वही उनकी अकादमिक जड़ों का केंद्र भी रहा है।

अपने 34 वर्षों के लंबे शिक्षण करियर में, उन्होंने 1988 में गोवा विश्वविद्यालय से शुरुआत की और 1993 में पुणे विश्वविद्यालय में शामिल हो गईं। JNU की कुलपति नियुक्त होने से पहले, वह सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में राजनीति और लोक प्रशासन विभाग में प्रोफेसर थीं।

कलम और ज़ुबान की धनी: 6 भाषाएं और 2 प्रभावशाली किताबें

शांतिश्री पंडित की भाषाई क्षमता अद्वितीय है। वह कुल छह भाषाओं—अंग्रेजी, हिंदी, तमिल, तेलुगु, मराठी और संस्कृत—पर शानदार पकड़ रखती हैं। यह भाषाई विविधता उन्हें भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक जटिलताओं को समझने में मदद करती है।

वह सिर्फ़ एक शिक्षिका ही नहीं, बल्कि एक सिद्धहस्त लेखिका भी हैं। उन्होंने अकादमिक जगत को दो महत्वपूर्ण पुस्तकें दी हैं:

  1. ‘Parliament and Foreign Policy in India’ (1990): यह किताब भारत की विदेश नीति को आकार देने में संसद की भूमिका का गहन विश्लेषण करती है।
  2. ‘Restructuring Environmental Governance in Asia-Ethics and Policy’ (2003): इस पुस्तक में उन्होंने एशिया में पर्यावरण से जुड़े शासन और नीतियों पर एक गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया है।

इनके अलावा, उन्होंने कई प्रतिष्ठित अकादमिक निकायों और संगठनों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है, जो अकादमिक जगत में उनके प्रभाव को दर्शाता है।

JNU का नेतृत्व: उपलब्धियों और चुनौतियों का दौर

फरवरी 2022 में जब शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित को JNU की 13वीं कुलपति नियुक्त किया गया, तो यह एक ऐतिहासिक क्षण था। उन्होंने JNU के 53 साल के इतिहास में इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला बनकर एक नई मिसाल कायम की। हालांकि, उनका कार्यकाल चुनौतियों से भरा रहा है। JNU जैसे वैचारिक रूप से सक्रिय विश्वविद्यालय का नेतृत्व करना किसी “कांटों भरे ताज” से कम नहीं है।

हाल ही में, उनका नाम शिक्षा मंत्रालय द्वारा गुजरात में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल न होने के कारण चर्चा में आया। यह मामला उन प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौतियों का एक उदाहरण है जिनका सामना एक कुलपति को करना पड़ता है। हालांकि, इन सामयिक विवादों से परे, उनका ध्यान विश्वविद्यालय में अकादमिक माहौल को बेहतर बनाने और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के कार्यान्वयन पर केंद्रित रहा है।

प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित की कहानी सिर्फ़ एक कुलपति की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी महिला की कहानी है जिसने वैश्विक परवरिश, गहरी अकादमिक समझ और बहुभाषी क्षमता के दम पर भारत के सबसे प्रतिष्ठित और चुनौतीपूर्ण विश्वविद्यालयों में से एक के शीर्ष पर अपनी जगह बनाई है। विवाद उनके कार्यकाल का एक हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन उनकी अकादमिक विरासत और एक “ट्रेलब्लेज़र” के रूप में उनकी पहचान कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण और स्थायी है।

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