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आंध्र प्रदेश में इस गणेशोत्सव पर पुणे-शैली की गणेश मूर्तियाँ छाई हुई हैं। जानिए क्यों है इनकी इतनी मांग, कैसे बदल रही है सप्लाई चेन, और क्या है कीमत का रुझान

पुणे-शैली की गणेश मूर्तियाँ आंध्र प्रदेश में लोकप्रिय – जानिए इस ट्रेंड के पीछे की पूरी कहानी

आंध्र प्रदेश में इस साल के गणेशोत्सव की तैयारियों में एक अलग ही हलचल है। बाजारों में सिर्फ पारंपरिक आंध्र शैली की गणेश प्रतिमाएँ ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की प्रसिद्ध पुणे-शैली की मूर्तियाँ भी धूम मचा रही हैं। चमचमाते आभूषण, असली कपड़े, और बारीकी से तराशे गए चेहरे इन मूर्तियों को खास बनाते हैं, और यही वजह है कि लोग इन्हें हाथों हाथ ले रहे हैं।

Pune-Ganpati-Festival

सोशल मीडिया से आया बदलाव

यह ट्रेंड अचानक से नहीं आया। पिछले साल कुछ आंध्र के भक्तों ने पुणे की मूर्तियाँ अपने उत्सव में इस्तेमाल कीं और उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर डाल दीं। Instagram Reels और YouTube शॉर्ट्स पर यह वीडियो लाखों बार देखे गए। नतीजा यह हुआ कि इस साल दुकानदारों और कारीगरों को पहले से ही पता था कि “पुणे-शैली” का नाम बिकने वाला है

पुणे-शैली की खासियत

पुणे-शैली की गणेश प्रतिमाएँ साधारण प्लास्टर ऑफ पेरिस या मिट्टी की मूर्तियों जैसी नहीं होतीं।
इनकी कुछ खास बातें हैं:

  • असली कपड़े: मूर्तियों को सजे-धजे कपड़े पहनाए जाते हैं, जो त्योहार के बाद भी सुरक्षित रखे जा सकते हैं।
  • आभूषण: चमकदार नकली सोने और चांदी के गहनों से सजावट।
  • प्राकृतिक बाल: कुछ मूर्तियों में असली जैसे दिखने वाले सिंथेटिक बाल लगाए जाते हैं।
  • भावपूर्ण चेहरे: कलाकार चेहरे के हावभाव पर खास ध्यान देते हैं, ताकि प्रतिमा में जीवंतता महसूस हो।

सप्लाई चेन का नया मॉडल

दिलचस्प बात यह है कि पूरी मूर्ति पुणे से नहीं आती।

  1. बेस स्ट्रक्चर (ढांचा) पुणे में बनता है।
  2. इन्हें आंध्र प्रदेश भेजा जाता है।
  3. यहाँ के स्थानीय कलाकार अंतिम पेंटिंग, कपड़े और आभूषण से सजावट करते हैं।

इस मॉडल से दोनों राज्यों को फायदा हो रहा है पुणे के मूर्तिकारों को नए बाजार मिल रहे हैं और आंध्र के कारीगरों को अतिरिक्त काम और आय के अवसर।

बाजार की तस्वीर

विजयवाड़ा के एक बड़े मूर्ति विक्रेता, बताते हैं:

पुणे

“इस साल हमने 200 से ज़्यादा पुणे-शैली की मूर्तियों का ऑर्डर पहले ही बुक कर लिया था। त्योहार शुरू होने से दो हफ्ते पहले ही आधा स्टॉक बिक चुका है।”

कीमतें आकार और सजावट के आधार पर ₹8,000 से ₹50,000 तक जा रही हैं। महंगी मूर्तियों में ज्यादा बारीक नक्काशी, असली कपड़े, और विशेष आभूषण लगाए जाते हैं।

ग्राहक भी बदले

पहले जहां ग्राहक दुकानदार के पास जाकर मूर्तियों में से चुनते थे, अब WhatsApp कैटलॉग और सोशल मीडिया पोस्ट देखकर पहले ही बुकिंग कर रहे हैं। कुछ लोग तो पुणे जाकर खुद मूर्तियाँ चुनकर ला रहे हैं।

त्योहार का सांस्कृतिक मेल

गणेशोत्सव महाराष्ट्र में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है, जबकि आंध्र प्रदेश में यह उत्सव उतना बड़ा नहीं था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आंध्र के शहरी इलाकों में यह त्योहार लोकप्रिय हुआ है, खासकर युवाओं और हाउसिंग सोसाइटी के स्तर पर।
पुणे-शैली की मूर्तियाँ इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान का बेहतरीन उदाहरण हैं—जहाँ महाराष्ट्र की कला और आंध्र की श्रद्धा मिलकर एक नया रंग भर रही है।

कारीगरों की कहानी

गुंटूर के स्थानीय कलाकार संतोष कहते हैं:

“पहले हम सिर्फ मिट्टी की साधारण मूर्तियाँ बनाते थे। अब पुणे-शैली की मांग आने के बाद हमें नई तकनीक सीखनी पड़ी। कपड़े सिलना, गहने लगाना, बाल सेट करना ये सब हमारे लिए नया अनुभव है, लेकिन अब काम भी ज्यादा और मज़ेदार हो गया है।”

त्योहार के बाद भी आकर्षण

पुणे-शैली की एक खासियत यह भी है कि लोग इन मूर्तियों को विसर्जन के बजाय घर में सजाकर रखते हैं। कुछ भक्त विसर्जन के लिए अलग साधारण मूर्ति लाते हैं और पुणे-शैली की मूर्ति को घर में स्थायी रूप से स्थापित करते हैं।

चुनौतियाँ भी हैं

हालांकि इस ट्रेंड ने बाजार में जोश भर दिया है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ भी हैं:

  • ट्रांसपोर्ट का खर्च: पुणे से आंध्र तक मूर्तियाँ लाने में लागत बढ़ जाती है।
  • नाज़ुक संरचना: सजावट और कपड़े की वजह से मूर्तियाँ और भी संवेदनशील हो जाती हैं, जिससे पैकिंग और हैंडलिंग में सावधानी चाहिए।

स्थानीय परंपरा का सवाल: कुछ लोग मानते हैं कि बाहर की शैली अपनाने से स्थानीय कला पर असर पड़ेगा।

क्या कहता है भविष्य?

बाजार के रुझान बताते हैं कि आने वाले वर्षों में इस तरह के इंटर स्टेट आर्ट ट्रेंड और बढ़ेंगे। जैसे दिल्ली में राजस्थान की मूर्तियाँ, बंगाल में दक्षिण भारतीय आभूषण-शैली, या गुजरात में कश्मीर के पेपरमाशी डेकोर। पुणे-शैली का यह ट्रेंड केवल एक शुरुआत हो सकता है।

पुणे-शैली की गणेश मूर्तियाँ सिर्फ एक वस्तु नहीं, बल्कि कला, श्रद्धा और संस्कृति का संगम हैं। यह ट्रेंड दिखाता है कि भारत में त्योहार केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान और रचनात्मक नवाचार का भी अवसर होते हैं।
इस साल आंध्र प्रदेश के गणेशोत्सव में जब ये चमचमाती मूर्तियाँ सजी हुई दिखेंगी, तो वे सिर्फ भगवान गणेश का स्वागत ही नहीं करेंगी बल्कि दो राज्यों की परंपराओं को एक ही मंच पर ला खड़ा करेंगी।

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